वन विभाग में ‘अंगद का पैर’! निचलौल रेंज में 5 साल से जमे RFO पर उठे सवाल, लकड़ी खेल और वसूली के आरोप
महराजगंज/निचलौल:
उत्तर प्रदेश सरकार की तबादला नीति और भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों के बीच निचलौल वन रेंज इन दिनों गंभीर चर्चाओं में है। यहां तैनात वन क्षेत्राधिकारी (RFO) सुनील कुमार राव पिछले करीब पांच वर्षों से एक ही रेंज में जमे हुए हैं। लंबा कार्यकाल अब विभागीय गलियारों से लेकर स्थानीय लोगों के बीच सवालों का कारण बनता जा रहा है।
क्षेत्र में चर्चा है कि जहां अधिकांश विभागों में तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर तबादले की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, वहीं निचलौल रेंज में यह नियम प्रभावी नजर नहीं आ रहा। स्थानीय लोग इसे “अंगद का पैर” बताते हुए सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ऐसी कौन-सी वजह है, जिसके चलते अधिकारी लगातार एक ही स्थान पर बने हुए हैं।
पकड़ी गई लकड़ी का ‘गायब रिकॉर्ड’?
सूत्रों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि जंगलों से पकड़ी जाने वाली कीमती लकड़ियों का पूरा रिकॉर्ड सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नहीं किया जाता। आरोप यह भी है कि कई मामलों में जब्त लकड़ियों को विभागीय डिपो तक पहुंचाने के बजाय सीधे आरामशीनों तक भेज दिया जाता है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो इससे सरकार को लाखों रुपये के राजस्व नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
‘ऊपर तक पहुंच’ की चर्चा
रेंज क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि कार्रवाई या शिकायतों की बात उठने पर अधिकारी अपनी “ऊंची पहुंच” का हवाला देते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इसी कथित संरक्षण के चलते रेंज में अवैध वसूली और सांठगांठ का नेटवर्क सक्रिय है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
जांच के घेरे में कई सवाल
आखिर पांच वर्षों से एक ही स्थान पर तैनाती कैसे बरकरार है?
जब्त लकड़ियों का पूरा रिकॉर्ड विभागीय अभिलेखों में मौजूद है या नहीं?
क्या लकड़ी माफियाओं और आरामशीन संचालकों से सांठगांठ की निष्पक्ष जांच होगी?
अवैध वसूली की शिकायतों पर विभागीय अधिकारी अब तक मौन क्यों हैं?
जनता ने उठाई उच्च स्तरीय जांच की मांग
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने मुख्यमंत्री एवं प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) से मामले की निष्पक्ष और गोपनीय जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि अधिकारी के कार्यकाल, संपत्ति और रेंज संचालन की गहराई से जांच कराई जाए तो कई अहम खुलासे सामने आ सकते हैं।
बड़ा सवाल
अब देखने वाली बात होगी कि वन विभाग और शासन स्तर के अधिकारी इन गंभीर आरोपों पर संज्ञान लेते हैं या फिर निचलौल रेंज में वर्षों से चल रही व्यवस्था यूं ही कायम रहती है।

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